विस्तृत उत्तर
कुशा (दर्भ/डाब) का आसन मंत्र जप और साधना के लिए सर्वोत्तम माना गया है:
शास्त्रीय आधार
1भगवद्गीता (6.11)
शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः। नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम्।।
अर्थ: शुद्ध स्थान पर, न अधिक ऊंचा न अधिक नीचा, कुश, मृगचर्म और वस्त्र का आसन बिछाकर ध्यान करे। स्वयं भगवान कृष्ण ने कुशा आसन का विधान बताया।
2'कुश' शब्द का अर्थ
संस्कृत श्लोक: 'पापाह्वयः कु शब्दः स्यात् श शब्दः शमनाह्वयः। तूर्णेन पापशमनं येनैतत्कुश उच्यते।।'
अर्थ: 'कु' = पाप, 'श' = शमन (नाश)। शीघ्र पापों का शमन करने वाला = 'कुश'।
3ब्रह्माण्ड पुराण
कलिकाल में सबसे शुद्ध और पवित्र आसन कुशा।' कुशा आसन पर जप से अनंत गुना फल।
4विद्युत कुचालक (वैज्ञानिक)
कुशा = विद्युत कुचालक (insulator)। जप से शरीर में उत्पन्न आध्यात्मिक ऊर्जा पृथ्वी में न बहे — कुशा रोकता है।
5कुशा = अमृत तत्व
पौराणिक: समुद्र मंथन से अमृत छलकने पर कुशा पर गिरा — इसलिए कुशा अमृत तत्व युक्त।
6कुशा = त्रिदेव
कुशा की जड़ = ब्रह्मा, मध्य = विष्णु, शीर्ष = शिव।
उपयोग नियम
- ▸कुशा आसन (चटाई) बिछाकर ऊपर वस्त्र रखें।
- ▸श्राद्ध कर्म में कुशा आसन = निषिद्ध (विशेष अपवाद)।
- ▸दूसरे का प्रयुक्त आसन न लें — नया आसन।
- ▸खुली भूमि पर बैठना वर्जित (ब्रह्माण्ड पुराण: दरिद्रता आती है)।
विकल्प: कुशा न मिले तो ऊनी कंबल, रेशमी वस्त्र, या मृगचर्म (deer skin) — ये भी शास्त्र सम्मत।





