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आत्मज्ञान📜 मांडूक्य उपनिषद, भगवद् गीता (4.37-38), भागवत पुराण — मोक्ष2 मिनट पठन

मंत्र जप से आत्मज्ञान कैसे प्राप्त होता है?

संक्षिप्त उत्तर

आत्मज्ञान कैसे: मांडूक्य — 'ॐ ही सब कुछ है।' जप से कर्म नष्ट → ज्ञान का मार्ग खुलता है। 'सोऽहम्' — श्वास में ब्रह्म (वह मैं हूँ)। 'शिवोऽहम्' — अद्वैत अनुभव। भागवत: नाम जपते-जपते नाम और नामी में अंतर मिट जाता है। परम फल: 'अहं ब्रह्मास्मि।'

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विस्तृत उत्तर

मंत्र जप से आत्मज्ञान का मार्ग मांडूक्य उपनिषद और भगवद् गीता में वर्णित है:

मांडूक्य उपनिषद

ॐ इत्येतदक्षरमिदं सर्वम्। तस्योपव्याख्यानम् — भूतं भवद् भविष्यदिति सर्वमोंकार एव।

— ॐ ही सब कुछ है — भूत, वर्तमान, भविष्य। ॐ का जप = ब्रह्म का जप = आत्मज्ञान।

जप से आत्मज्ञान का मार्ग

1शुद्धि

भगवद् गीता (4.37): जप-तप ज्ञानाग्नि है जो कर्मों को जलाती है। कर्म नष्ट → आत्मज्ञान का मार्ग खुलता है।

2'सोऽहम्' — जप का परम रहस्य

तंत्र शास्त्र: 'सोऽहम्' — 'वह (ब्रह्म) मैं हूँ।' श्वास में — 'सः' (श्वास लेते) + 'अहम्' (श्वास छोड़ते)। यह अजपा जप — निरंतर।

3'शिवोऽहम्' — अद्वैत

आदि शंकराचार्य: 'चिदानंदरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम्।' — मैं चिदानंद स्वरूप शिव हूँ। यह आत्मज्ञान का जप।

4नाम से नामी तक

भागवत — पहले भगवान का नाम जपो → फिर नाम और नामी में अंतर मिट जाता है → नामी (भगवान) से एकता = आत्मज्ञान।

5भगवद् गीता (4.38)

न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते।' — ज्ञान के समान पवित्र इस संसार में कुछ नहीं। जप = ज्ञान का मार्ग।

परम सत्य

जप का परम फल — 'अहं ब्रह्मास्मि' — मैं ब्रह्म हूँ — की अनुभूति।

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शास्त्रीय स्रोत
मांडूक्य उपनिषद, भगवद् गीता (4.37-38), भागवत पुराण — मोक्ष
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