विस्तृत उत्तर
मंत्र जप से आत्मज्ञान का मार्ग मांडूक्य उपनिषद और भगवद् गीता में वर्णित है:
मांडूक्य उपनिषद
ॐ इत्येतदक्षरमिदं सर्वम्। तस्योपव्याख्यानम् — भूतं भवद् भविष्यदिति सर्वमोंकार एव।
— ॐ ही सब कुछ है — भूत, वर्तमान, भविष्य। ॐ का जप = ब्रह्म का जप = आत्मज्ञान।
जप से आत्मज्ञान का मार्ग
1शुद्धि
भगवद् गीता (4.37): जप-तप ज्ञानाग्नि है जो कर्मों को जलाती है। कर्म नष्ट → आत्मज्ञान का मार्ग खुलता है।
2'सोऽहम्' — जप का परम रहस्य
तंत्र शास्त्र: 'सोऽहम्' — 'वह (ब्रह्म) मैं हूँ।' श्वास में — 'सः' (श्वास लेते) + 'अहम्' (श्वास छोड़ते)। यह अजपा जप — निरंतर।
3'शिवोऽहम्' — अद्वैत
आदि शंकराचार्य: 'चिदानंदरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम्।' — मैं चिदानंद स्वरूप शिव हूँ। यह आत्मज्ञान का जप।
4नाम से नामी तक
भागवत — पहले भगवान का नाम जपो → फिर नाम और नामी में अंतर मिट जाता है → नामी (भगवान) से एकता = आत्मज्ञान।
5भगवद् गीता (4.38)
न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते।' — ज्ञान के समान पवित्र इस संसार में कुछ नहीं। जप = ज्ञान का मार्ग।
परम सत्य
जप का परम फल — 'अहं ब्रह्मास्मि' — मैं ब्रह्म हूँ — की अनुभूति।





