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आत्मज्ञान📜 तंत्रालोक — प्रत्यभिज्ञा दर्शन, विज्ञान भैरव तंत्र, कुलार्णव तंत्र2 मिनट पठन

तंत्र साधना से आत्मज्ञान कैसे मिलता है?

संक्षिप्त उत्तर

तंत्र से आत्मज्ञान: प्रत्यभिज्ञा — 'मैं पहले से ही शिव हूँ।' 'सोऽहम्' श्वास में। कुंडलिनी सहस्रार = शिव-शक्ति मिलन। द्वैत विसर्जन। विज्ञान भैरव: 'यह तो मैं ही हूँ!' कुलार्णव: 'शिवभावेन पूजयेत्।'

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विस्तृत उत्तर

तंत्र साधना से आत्मज्ञान का मार्ग तंत्रालोक और विज्ञान भैरव तंत्र में वर्णित है:

तंत्रालोक — प्रत्यभिज्ञा

प्रत्यभिज्ञा' = पुनः-पहचानना। आत्मज्ञान = यह पहचानना कि 'मैं पहले से ही शिव हूँ।

तंत्र से आत्मज्ञान का क्रम

1देह को मंदिर जानना

जब अनुभव हो — 'यह देह शिव की अभिव्यक्ति है' — तब 'देह-मैं' से 'आत्म-मैं' का जागरण।

2'सोऽहम्' — श्वास में ज्ञान

विज्ञान भैरव: प्रत्येक श्वास में 'सः' (वह-शिव) + 'हम्' (मैं) — दोनों एक। यह बोध = आत्मज्ञान।

3कुंडलिनी का सहस्रार तक जागरण

tंत्रालोक: कुंडलिनी जब सहस्रार तक पहुँचती है — शिव-शक्ति का मिलन = आत्मज्ञान।

4द्वैत का विसर्जन

मैं साधक हूँ' और 'वह देवता है' — यह भेद मिटे — शुद्ध चेतना का बोध।

5विज्ञान भैरव तंत्र

112 विधियों में से किसी एक से — 'अरे, यह तो मैं ही हूँ!' — यह प्रत्यभिज्ञा = आत्मज्ञान।

कुलार्णव

शिवभावेन पूजयेत्।' — शिव-भाव से पूजा करो — स्वयं शिव बन जाओगे।
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शास्त्रीय स्रोत
तंत्रालोक — प्रत्यभिज्ञा दर्शन, विज्ञान भैरव तंत्र, कुलार्णव तंत्र
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