विस्तृत उत्तर
तंत्र साधना से आत्मज्ञान का मार्ग तंत्रालोक और विज्ञान भैरव तंत्र में वर्णित है:
तंत्रालोक — प्रत्यभिज्ञा
प्रत्यभिज्ञा' = पुनः-पहचानना। आत्मज्ञान = यह पहचानना कि 'मैं पहले से ही शिव हूँ।
तंत्र से आत्मज्ञान का क्रम
1देह को मंदिर जानना
जब अनुभव हो — 'यह देह शिव की अभिव्यक्ति है' — तब 'देह-मैं' से 'आत्म-मैं' का जागरण।
2'सोऽहम्' — श्वास में ज्ञान
विज्ञान भैरव: प्रत्येक श्वास में 'सः' (वह-शिव) + 'हम्' (मैं) — दोनों एक। यह बोध = आत्मज्ञान।
3कुंडलिनी का सहस्रार तक जागरण
tंत्रालोक: कुंडलिनी जब सहस्रार तक पहुँचती है — शिव-शक्ति का मिलन = आत्मज्ञान।
4द्वैत का विसर्जन
मैं साधक हूँ' और 'वह देवता है' — यह भेद मिटे — शुद्ध चेतना का बोध।
5विज्ञान भैरव तंत्र
112 विधियों में से किसी एक से — 'अरे, यह तो मैं ही हूँ!' — यह प्रत्यभिज्ञा = आत्मज्ञान।
कुलार्णव
शिवभावेन पूजयेत्।' — शिव-भाव से पूजा करो — स्वयं शिव बन जाओगे।





