विस्तृत उत्तर
मंत्र जप से कर्म-शुद्धि का शास्त्रीय विवेचन — भागवत के सबसे गहरे प्रसंगों में से एक:
भगवद्गीता (4.37) — ज्ञान-अग्नि से कर्म-भस्म
यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरुते ऽर्जुन।
ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा।।'
— जैसे प्रज्वलित अग्नि लकड़ी को भस्म करती है, वैसे ज्ञान-अग्नि सभी कर्मों को नष्ट करती है। मंत्र-जप इसी ज्ञान-अग्नि को जागृत करता है।
अजामिल आख्यान (भागवत 6.1.13-15) — मंत्र से कर्म-क्षय का अनुपम उदाहरण
अजामिल — जीवन भर पापकर्म करने के बावजूद — मृत्युकाल में अपने पुत्र 'नारायण' का नाम लेकर मुक्त हो गया। यमदूतों ने पापों का हिसाब रखा था — परंतु भगवान के दूतों ने कहा:
संकीर्त्य नारायणशब्दमात्रं विमुक्तदुःखः।
— 'नारायण' के एक उच्चारण मात्र से सभी पाप नष्ट हो गए। यह मंत्र की असीम कर्म-शुद्धि क्षमता का प्रमाण है।
कर्म के तीन प्रकार और मंत्र जप का प्रभाव
1संचित कर्म (जमा कर्म)
विष्णु पुराण (6.8.13): नित्य नाम-जप से संचित कर्म क्षय होते हैं। यह धीमी परंतु निश्चित प्रक्रिया है।
2प्रारब्ध कर्म (भोगे जाने वाले कर्म)
भागवत (11.14.19): प्रारब्ध कर्म भोगने ही पड़ते हैं — परंतु मंत्र-जप उनकी तीव्रता कम करता है और साधक को उन्हें 'प्रसाद' की तरह स्वीकार करने की शक्ति देता है।
3आगामी कर्म (भविष्य के कर्म)
भगवद्गीता (18.66): 'सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि।' — भगवान को शरण लेने पर भविष्य के पापकर्म नहीं होते — क्योंकि मन शुद्ध हो जाता है।
कर्म-शुद्धि का चक्र
मंत्र-जप → चित्त-शुद्धि → अहंकार-क्षय → नए पापकर्म बंद → पुराने कर्मों का क्षय। यह चक्र धीमा परंतु अमोघ है।
भागवत का सत्य
भगवान का एक नाम भी — यदि श्रद्धा से लिया जाए — अनंत पाप-कर्मों को नष्ट करने में समर्थ है।





