विस्तृत उत्तर
मंत्र जप से मोक्ष-प्राप्ति — भारतीय दर्शन के केंद्र का प्रश्न:
भागवत पुराण (6.1.15) — मोक्ष का अमोघ मार्ग
कीर्तनादेव कृष्णस्य मुक्तसंगः परं व्रजेत्।
— श्रीकृष्ण के कीर्तन (मंत्र-जप) से ही संगबंधन से मुक्त होकर परम पद को प्राप्त होता है।
भगवद्गीता (8.7) — अंतकाल की स्मृति
यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम्।
तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः।।'
— मृत्यु के समय जो भाव मन में हो — वही अगला जन्म निश्चित करता है। नित्य मंत्र-जप का अभ्यास — अंतकाल में भगवान की स्मृति को स्वाभाविक बनाता है। यही मोक्ष का द्वार है।
मोक्ष के चार प्रकार और मंत्र-जप
1सालोक्य मोक्ष (भगवान के लोक में वास)
नित्य नाम-जप और भक्ति से — मृत्योपरांत भगवद्धाम की प्राप्ति।
2सामीप्य मोक्ष (भगवान के निकट वास)
भागवत (2.4.15): निष्काम भक्ति और मंत्र-जप से — भगवान के समीप नित्य रहने की मुक्ति।
3सारूप्य मोक्ष (भगवान जैसा स्वरूप)
भगवद्गीता (18.65): 'मन्मना भव मद्भक्तः... मामेवैष्यसि।' — भगवान में मन लगाने वाला उनका स्वरूप पाता है।
4सायुज्य मोक्ष (ब्रह्म में लीनता)
मुक्तिकोपनिषद: ज्ञान-मार्ग में ब्रह्म में लीन होना — ॐ-जप का अंतिम फल।
मंत्र जप मोक्ष का मार्ग — चार कारण
- 1कर्म-क्षय — संचित पाप कर्म नष्ट (जन्म-मृत्यु का आधार)
- 2अहंकार-विसर्जन — 'मैं' का भाव घटना — यही बंधन का मूल
- 3भगवत्-स्मृति — अंतकाल में भगवान की स्मृति = मोक्ष का द्वार
- 4निष्काम भाव — जप फल की इच्छा न करना = 'निष्काम कर्म'
नारद भक्तिसूत्र (82)
यल्लब्ध्वा नान्यद्गवति... तन्मयो भवति।
— जो पाकर अन्य कुछ नहीं चाहता और उसमें लीन हो जाता है — वही मोक्ष है।





