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मंत्र जप📜 भागवत पुराण (2.4.15, 6.1.15), भगवद्गीता (8.7, 18.65-66), मुक्तिकोपनिषद, विष्णु पुराण (6.8.13), नारद भक्तिसूत्र (82)2 मिनट पठन

मंत्र जप से मोक्ष कैसे प्राप्त होता है?

संक्षिप्त उत्तर

भागवत (6.1.15): कृष्ण-कीर्तन से परम पद। गीता (8.7): अंतकाल जो भाव — वही अगली गति। नित्य जप = अंतकाल में भगवत्-स्मृति सुनिश्चित। मोक्ष के प्रकार: सालोक्य, सामीप्य, सारूप्य, सायुज्य। मार्ग: कर्म-क्षय + अहंकार-विसर्जन + निष्काम जप = मुक्ति।

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विस्तृत उत्तर

मंत्र जप से मोक्ष-प्राप्ति — भारतीय दर्शन के केंद्र का प्रश्न:

भागवत पुराण (6.1.15) — मोक्ष का अमोघ मार्ग

कीर्तनादेव कृष्णस्य मुक्तसंगः परं व्रजेत्।

— श्रीकृष्ण के कीर्तन (मंत्र-जप) से ही संगबंधन से मुक्त होकर परम पद को प्राप्त होता है।

भगवद्गीता (8.7) — अंतकाल की स्मृति

यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम्।

तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः।।'

— मृत्यु के समय जो भाव मन में हो — वही अगला जन्म निश्चित करता है। नित्य मंत्र-जप का अभ्यास — अंतकाल में भगवान की स्मृति को स्वाभाविक बनाता है। यही मोक्ष का द्वार है।

मोक्ष के चार प्रकार और मंत्र-जप

1सालोक्य मोक्ष (भगवान के लोक में वास)

नित्य नाम-जप और भक्ति से — मृत्योपरांत भगवद्धाम की प्राप्ति।

2सामीप्य मोक्ष (भगवान के निकट वास)

भागवत (2.4.15): निष्काम भक्ति और मंत्र-जप से — भगवान के समीप नित्य रहने की मुक्ति।

3सारूप्य मोक्ष (भगवान जैसा स्वरूप)

भगवद्गीता (18.65): 'मन्मना भव मद्भक्तः... मामेवैष्यसि।' — भगवान में मन लगाने वाला उनका स्वरूप पाता है।

4सायुज्य मोक्ष (ब्रह्म में लीनता)

मुक्तिकोपनिषद: ज्ञान-मार्ग में ब्रह्म में लीन होना — ॐ-जप का अंतिम फल।

मंत्र जप मोक्ष का मार्ग — चार कारण

  1. 1कर्म-क्षय — संचित पाप कर्म नष्ट (जन्म-मृत्यु का आधार)
  2. 2अहंकार-विसर्जन — 'मैं' का भाव घटना — यही बंधन का मूल
  3. 3भगवत्-स्मृति — अंतकाल में भगवान की स्मृति = मोक्ष का द्वार
  4. 4निष्काम भाव — जप फल की इच्छा न करना = 'निष्काम कर्म'

नारद भक्तिसूत्र (82)

यल्लब्ध्वा नान्यद्गवति... तन्मयो भवति।

— जो पाकर अन्य कुछ नहीं चाहता और उसमें लीन हो जाता है — वही मोक्ष है।

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शास्त्रीय स्रोत
भागवत पुराण (2.4.15, 6.1.15), भगवद्गीता (8.7, 18.65-66), मुक्तिकोपनिषद, विष्णु पुराण (6.8.13), नारद भक्तिसूत्र (82)
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