ॐ नमः शिवाय  |  जय श्री राम  |  हरे कृष्ण
📿
धर्म-संबंधी शंका हो? शास्त्रों में उत्तर है।
पौराणिक प्रश्नोत्तरी — वेद, पुराण और तंत्र-शास्त्रों से प्रमाणित उत्तर, सरल हिंदी में
सभी प्रश्न देखें →
श्राद्ध विधि⏱ 4 मिनट पठन

पवित्री क्या है?

पवित्री कुशा घास से निर्मित अंगूठी है, जो श्राद्धकर्ता अनामिका अंगुली में अनिवार्य रूप से धारण करता है।

संक्षिप्त उत्तर

पवित्री कुशा घास से निर्मित अंगूठी है, जो श्राद्धकर्ता अनामिका अंगुली में अनिवार्य रूप से धारण करता है। कुशा की उत्पत्ति भगवान वराह के दिव्य रोमों से हुई है। यह कर्ता की शुद्धता का प्रतीक है, और बिना पवित्री श्राद्ध अधूरा माना जाता है।

📖

विस्तृत उत्तर

पवित्री श्राद्धकर्ता द्वारा अनामिका अंगुली में धारण की जाने वाली कुशा घास की अंगूठी है। शास्त्रीय परिभाषा के अनुसार अनामिका अंगुली में कुशा घास से निर्मित पवित्री अर्थात् अंगूठी धारण करना अनिवार्य है।

इसका स्वरूप देखें तो इसकी सामग्री कुशा घास होती है, और कुशा एक विशेष पवित्र घास है। इसका आकार अंगूठी जैसा होता है, जो अंगुली में पहनने योग्य होती है। इसे अनामिका अंगुली में धारण किया जाता है, अर्थात् ring finger में, जो अंगूठे से तीसरी अंगुली होती है। कुशा से बनाने का कारण भी विशेष है। कुशा शास्त्रों में अत्यंत पवित्र घास मानी जाती है। इसकी उत्पत्ति भगवान वराह के दिव्य रोमों से हुई है, इसलिए इसे श्राद्ध में सर्वोच्च स्थान प्राप्त है।

कुशा की उत्पत्ति की कथा भी रोचक है। तदनंतर भगवान के शरीर से उत्पन्न पसीने की बूंदों से पृथ्वी पर काले तिल की उत्पत्ति हुई, और उनके दिव्य रोमों से पवित्र कुशा घास का प्रादुर्भाव हुआ। अनामिका में पहनने का कारण यह है कि अनामिका श्राद्ध और पितृ कार्य के लिए विशेष अंगुली है, और शास्त्रों ने इस अंगुली को निर्धारित किया है।

यहाँ अनिवार्य शब्द का विशेष महत्व है। शास्त्रों ने अनिवार्य है शब्द प्रयोग किया है, अर्थात् पवित्री बिना श्राद्ध अधूरा है, और इसका कोई विकल्प नहीं है। श्राद्धकर्ता की पूर्ण तैयारी में पवित्री का स्थान महत्वपूर्ण है। पहले स्नान अर्थात् पूर्ण शुद्धि, फिर श्वेत धोती अर्थात् सफेद वस्त्र, फिर पवित्री अनामिका में कुशा अंगूठी, फिर जनेऊ अपसव्य अर्थात् दाएं कंधे पर, और अंत में दक्षिण मुख अर्थात् दक्षिण दिशा में मुख।

पवित्री का महत्व कई कारणों से है। पहला कारण है शुद्धता का प्रतीक, क्योंकि कुशा पवित्र होती है, और पवित्री कर्ता की शुद्धि का प्रतीक है। दूसरा कारण है आध्यात्मिक रक्षा, क्योंकि यह नकारात्मक ऊर्जाओं से रक्षा करती है और पवित्र वातावरण बनाती है। तीसरा कारण है शास्त्रीय अनिवार्यता, क्योंकि बिना पवित्री श्राद्ध अधूरा है और यह अनिवार्य अंग है।

कुशा का अन्य उपयोग भी श्राद्ध में होता है। तर्पण में कुशा हाथ में लेकर तर्पण किया जाता है। वेदी पर कुशा बिछाकर पिण्ड स्थापित किए जाते हैं। पवित्री में कुशा अंगुली में अंगूठी रूप में पहनी जाती है। कुशा इतनी पवित्र इसलिए मानी जाती है क्योंकि यह भगवान वराह के दिव्य रोमों से उत्पन्न हुई है, साक्षात् नारायण के शरीर से प्रकट हुई है, इसलिए श्राद्ध में अनिवार्य है। शास्त्रीय स्रोत के रूप में आश्वलायन गृह्यसूत्र, गरुड़ पुराण और याज्ञवल्क्य स्मृति में श्राद्ध की सूक्ष्म विधि का विस्तार से वर्णन है। पवित्री कर्ता की चलती-फिरती शुद्धि की तरह है, क्योंकि श्राद्ध के पूरे समय यह अंगुली में रहती है। निष्कर्षतः पवित्री कुशा घास से निर्मित अंगूठी है, जो श्राद्धकर्ता अनामिका अंगुली में अनिवार्य रूप से धारण करता है, और यह कर्ता की शुद्धता का प्रतीक तथा श्राद्ध की अनिवार्य सामग्री है।

🔗

आगे क्या पढ़ें

प्रश्न से जुड़े हब और आज के उपयोगी लिंक

इसे अपने प्रियजनों के साथ साझा करें
WhatsApp
क्या यह उत्तर सहायक था?

🏷 सम्बंधित विषय

पवित्रीकुशा अंगूठीअनामिकाश्राद्ध सामग्री
📚

विस्तार से पढ़ें

इस विषय पर हमारे विस्तृत लेख और मार्गदर्शिकाएँ

पवित्री क्या है — शास्त्रों के अनुसार

पौराणिक पर आपको श्राद्ध विधि से जुड़े प्रमाणिक प्रश्न-उत्तर मिलेंगे। अन्य प्रश्नों के लिए प्रश्नोत्तरी पृष्ठ देखें।

🙏 पूजा विधि📿 मंत्र जाप🔱 शिव पूजा🏠 वास्तु💭 सपनों का मतलब🪐 ज्योतिष

इसी विषय पर और प्रश्नोत्तर

टैग द्वारा खोजें:#पवित्री#कुशा अंगूठी#अनामिका#श्राद्ध सामग्री