विस्तृत उत्तर
पीपल वृक्ष सनातन धर्म में सर्वाधिक पूजनीय वृक्ष है। भगवद्गीता (10.26) में श्रीकृष्ण ने कहा — 'अश्वत्थः सर्ववृक्षाणाम्' अर्थात् सभी वृक्षों में मैं पीपल हूँ। पुराणों में पीपल को साक्षात् विष्णु का स्वरूप माना गया है।
परिक्रमा का समय
सूर्योदय के पश्चात् प्रातःकाल (लगभग 7 बजे तक) पीपल की परिक्रमा और पूजा का सर्वोत्तम समय है। शास्त्रों के अनुसार सूर्योदय से पूर्व पीपल के पास नहीं जाना चाहिए — इस समय अलक्ष्मी का वास माना गया है। शनिवार को पीपल पूजा विशेष शुभ है क्योंकि पीपल पर शनि की छाया मानी जाती है।
परिक्रमा की संख्या
विभिन्न ग्रंथों में भिन्न-भिन्न संख्या मिलती है:
- ▸सामान्य नित्य पूजा में 7 परिक्रमा का विधान प्रचलित है।
- ▸विषम संख्या (3, 5, 7, 9, 11) में परिक्रमा शुभ मानी जाती है।
- ▸108 परिक्रमा सर्वाधिक शुभ मानी गई है — सोमवती अमावस्या पर स्त्रियाँ 108 परिक्रमा करती हैं।
- ▸विष्णु पुराण के आधार पर 3 परिक्रमा से तीनों लोकों की परिक्रमा का पुण्य, 4 परिक्रमा विष्णु के चतुर्भुज स्वरूप के लिए।
- ▸मंगलवार को 8 परिक्रमा का विशेष विधान भी मिलता है।
परिक्रमा की विधि
- 1स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
- 2पीपल की जड़ में जल चढ़ाएँ — स्टील या पीतल के लोटे से (तांबे के लोटे से नहीं, क्योंकि तांबा सूर्य की धातु है और सूर्य-शनि में शत्रुता है)।
- 3जल में काली तिल और चावल मिलाएँ।
- 4हल्दी, कुमकुम, अक्षत, पुष्प अर्पित करें।
- 5परिक्रमा सदैव दक्षिणावर्त (घड़ी की दिशा में, दाहिने हाथ की ओर से) करें।
- 6परिक्रमा करते समय 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' या 'ॐ शं शनिश्चराय नमः' मंत्र का जप करें।
- 7शनिवार को सरसों के तेल का दीपक जलाना विशेष शुभ है।
फल
पीपल परिक्रमा से शनि दोष, पितृ दोष, नवग्रह दोष की निवृत्ति, धन-धान्य प्राप्ति, और मोक्ष मार्ग प्राप्त होता है।





