विस्तृत उत्तर
पूजा घर में जल कलश रखना शुभ और शास्त्रसम्मत माना जाता है। कलश जल तत्व, पूर्णता और मांगल्य का प्रतीक है। इसके रखने की अवधि के बारे में विभिन्न परंपराओं में अलग-अलग नियम हैं।
सामान्य नियम
- 1नित्य पूजा का कलश — प्रतिदिन पूजा में उपयोग होने वाले जल पात्र (लोटा/कलश) का जल प्रतिदिन बदलना चाहिए। बासी जल से पूजा उचित नहीं मानी जाती।
- 1गंगाजल कलश — गंगाजल पवित्र जल होने के कारण लंबे समय तक रखा जा सकता है। तांबे के पात्र में गंगाजल वर्षों तक शुद्ध रहता है — ऐसी परंपरागत मान्यता है। तांबे के जीवाणुरोधी गुण इसे वैज्ञानिक रूप से भी समर्थन देते हैं।
- 1स्थापित कलश (विशेष पूजा) — नवरात्रि, सत्यनारायण कथा या अन्य विशेष अनुष्ठान में स्थापित कलश पूजा की अवधि तक ही रखा जाता है। अनुष्ठान समाप्ति पर कलश का जल तुलसी के पौधे या पवित्र स्थान पर विसर्जित करें।
- 1वास्तु जल कलश — वास्तु शुद्धि हेतु ईशान कोण में रखा गया जल कलश सप्ताह में एक बार बदलना उचित है।
कलश में जल बदलने के संकेत
- ▸जल का रंग बदल जाए
- ▸जल में शैवाल या कीट दिखें
- ▸जल से दुर्गंध आए
कलश रखने के नियम
- ▸तांबे या पीतल का कलश सर्वोत्तम है।
- ▸कलश के मुख पर आम के पत्ते और नारियल रखना शुभ माना जाता है।
- ▸कलश को स्वच्छ आसन (लाल कपड़ा या चौकी) पर रखें।
- ▸टूटा या दरार वाला कलश न रखें।





