विस्तृत उत्तर
पूजा का आध्यात्मिक महत्व भागवत पुराण, भगवद् गीता और उपनिषदों में विस्तार से वर्णित है:
1ईश्वर से संबंध
पूजा वह माध्यम है जिससे मनुष्य ईश्वर से सीधे जुड़ता है। भागवत: 'पूजनं नाम भगवद्विषयकम्' — पूजा भगवान से संबंध का नाम है।
2नवधा भक्ति में पूजन
भागवत पुराण (7.5.23) में नवधा भक्ति में 'अर्चन' (पूजन) एक अंग है:
> 'श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पादसेवनम्। अर्चनं वंदनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम्।'
3मन का परिष्कार
नित्य पूजा से मन में नम्रता, कृतज्ञता और शांति आती है। अहंकार क्षीण होता है।
4गीता का वचन (9.26-28)
श्रीकृष्ण कहते हैं — 'जो भी करो, खाओ, यज्ञ करो — सब मुझे अर्पित करो। इस प्रकार पूजा जीवन का अंग बन जाती है।'
5मोक्ष का मार्ग
भक्ति योग — पूजा और भजन — मोक्ष का सुलभ मार्ग है। भागवत: 'भक्तिर्भगवद्ज्ञानं च मोक्षहेतुः।'
6जीवन में अर्थ
पूजा जीवन को उद्देश्य और अर्थ देती है — हर कार्य ईश्वर की सेवा बन जाता है।





