ॐ नमः शिवाय  |  जय श्री राम  |  हरे कृष्ण
📿
धर्म-संबंधी शंका हो? शास्त्रों में उत्तर है।
पौराणिक प्रश्नोत्तरी — वेद, पुराण और तंत्र-शास्त्रों से प्रमाणित उत्तर, सरल हिंदी में
सभी प्रश्न देखें →
पूजा विधि📜 भगवद् गीता (17.16), मनुस्मृति, योग दर्शन (पातंजल) — मौन महत्व2 मिनट पठन

पूजा के दौरान मौन क्यों रखा जाता है?

संक्षिप्त उत्तर

मौन क्यों: गीता 17.16 — मौन मानस तप का अंग। बोलने की ऊर्जा भक्ति में लगती है। मन देव पर केंद्रित रहता है। पतंजलि: प्रत्याहार (इंद्रिय निग्रह) का प्रारंभ। जप के बाद कुछ क्षण मौन में बैठें — आंतरिक नाद सुनें।

📖

विस्तृत उत्तर

पूजा में मौन का महत्व भगवद् गीता, मनुस्मृति और पातंजल योग में वर्णित है:

1मानस तप

भगवद् गीता (17.16) में 'मौन' को मानस तप का एक अंग कहा गया है:

मनःप्रसादः सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रहः' — मन की प्रसन्नता, सौम्यता और मौन मानस तप हैं।

2ऊर्जा का संचय

बोलने में ऊर्जा व्यय होती है। मौन रहने से वह ऊर्जा भक्ति और ध्यान में लगती है।

3मन की एकाग्रता

बात करने से मन बाहरी विषयों में जाता है। मौन में मन देव के प्रति केंद्रित रहता है।

4पातंजल योग

पतंजलि के अष्टांग योग में 'प्रत्याहार' (इंद्रियों का निग्रह) महत्वपूर्ण है। वाणी का निग्रह — मौन — प्रत्याहार का प्रारंभ है।

5नाद श्रवण

मौन में साधक मंत्र जप की आंतरिक ध्वनि सुन सकता है। गहरे मौन में 'अनहद नाद' का अनुभव होता है।

व्यावहारिक नियम

पूजा के दौरान अनावश्यक बात न करें। मंत्र जप और भजन — यह 'वाक् तप' है, मौन नहीं। जप के बाद कुछ क्षण पूर्ण मौन में बैठें।

📜
शास्त्रीय स्रोत
भगवद् गीता (17.16), मनुस्मृति, योग दर्शन (पातंजल) — मौन महत्व
क्या यह उत्तर उपयोगी था? इसे अपने प्रियजनों के साथ साझा करें

🏷 सम्बंधित विषय

मौनएकाग्रताध्यानपूजा

इसी विषय के अन्य प्रश्न

📚

विस्तार से पढ़ें

इस विषय पर हमारे विस्तृत लेख और मार्गदर्शिकाएँ

पूजा के दौरान मौन क्यों रखा जाता है — शास्त्रों के अनुसार

पौराणिक पर आपको पूजा विधि से जुड़े प्रमाणिक प्रश्न-उत्तर मिलेंगे। यह उत्तर भगवद् गीता (17.16), मनुस्मृति, योग दर्शन (पातंजल) — मौन महत्व पर आधारित है। अन्य प्रश्नों के लिए प्रश्नोत्तरी पृष्ठ देखें।