विस्तृत उत्तर
पूजा में मौन का महत्व भगवद् गीता, मनुस्मृति और पातंजल योग में वर्णित है:
1मानस तप
भगवद् गीता (17.16) में 'मौन' को मानस तप का एक अंग कहा गया है:
मनःप्रसादः सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रहः' — मन की प्रसन्नता, सौम्यता और मौन मानस तप हैं।
2ऊर्जा का संचय
बोलने में ऊर्जा व्यय होती है। मौन रहने से वह ऊर्जा भक्ति और ध्यान में लगती है।
3मन की एकाग्रता
बात करने से मन बाहरी विषयों में जाता है। मौन में मन देव के प्रति केंद्रित रहता है।
4पातंजल योग
पतंजलि के अष्टांग योग में 'प्रत्याहार' (इंद्रियों का निग्रह) महत्वपूर्ण है। वाणी का निग्रह — मौन — प्रत्याहार का प्रारंभ है।
5नाद श्रवण
मौन में साधक मंत्र जप की आंतरिक ध्वनि सुन सकता है। गहरे मौन में 'अनहद नाद' का अनुभव होता है।
व्यावहारिक नियम
पूजा के दौरान अनावश्यक बात न करें। मंत्र जप और भजन — यह 'वाक् तप' है, मौन नहीं। जप के बाद कुछ क्षण पूर्ण मौन में बैठें।





