विस्तृत उत्तर
पूजा में आसन का नियम मनुस्मृति, धर्म सिंधु और भगवद् गीता में वर्णित है:
भगवद् गीता (6.11-12) के अनुसार
> 'शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः।
> नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम्।।'
— शुद्ध स्थान पर, न अधिक ऊँचा न अधिक नीचा, वस्त्र-चर्म-कुश के आसन पर बैठें।
पूजा के लिए उपयुक्त आसन
| आसन | उपयुक्तता |
|-----|------------|
| कुश आसन | सर्वोत्तम — वैदिक, सभी देवताओं के लिए |
| ऊनी आसन | सामान्य पूजा — सात्विक |
| लाल/पीत कपड़ा | शक्ति/विष्णु पूजा |
| काला कंबल | शिव/काली साधना |
| रेशम आसन | उत्तम — किंतु मँहगा |
वर्जित
- ▸भूमि पर सीधे बैठना
- ▸पत्थर या सीमेंट पर
- ▸धातु पर
आसन के नियम
- 1एक ही आसन नित्य उपयोग करें — सिद्ध होता है
- 2दूसरे इस पर न बैठें
- 3आसन को मोड़कर रखें
- 4आसन स्वच्छ हो
मनुस्मृति
कुशासनमुपासीत, धर्ममाचरन् नरः।' — धर्म का आचरण करते हुए कुश आसन पर बैठें।





