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विस्तृत उत्तर
प्रपितामह यानी परदादा को आदित्य स्वरूप माना गया है। वे तीसरी ऊर्ध्व पीढ़ी के पिण्डभाज पितर हैं और प्रत्यक्ष पिण्ड के अधिकारी होते हैं। आदित्य स्वरूप पितृ अवस्था अधिक प्रकाशमय और उच्चतर मानी जाती है। इसीलिए श्राद्ध में पिता को वसु, पितामह को रुद्र और प्रपितामह को आदित्य रूप से तृप्त किया जाता है।
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