विस्तृत उत्तर
प्रपितामह, अर्थात परदादा, को आदित्य स्वरूप इसलिए माना जाता है क्योंकि पितृ वर्गीकरण में तृतीय पीढ़ी को आदित्य अवस्था से जोड़ा गया है। मनुस्मृति में स्पष्ट कहा गया है कि प्रपितामहों को आदित्य कहा गया है और यह सनातन श्रुति है। आदित्य परम शुद्ध, प्रकाशमय और उच्चतम पितृ अवस्था के सूचक हैं। यह अवस्था जीव की उस स्थिति का प्रतिनिधित्व करती है जो जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त होने, मोक्ष प्राप्त करने या उच्चतम स्वर्गीय गति प्राप्त करने के निकट है। इसलिए परदादा को आदित्य स्वरूप माना जाता है।
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