विस्तृत उत्तर
प्रयागराज का त्रिवेणी संगम — जहाँ गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती नदियाँ मिलती हैं — सनातन धर्म में सर्वाधिक पवित्र तीर्थस्थल माना जाता है। इसे 'तीर्थराज प्रयाग' कहा गया है।
शास्त्रीय महत्व
1ब्रह्मपुराण
संगम स्नान का फल अश्वमेध यज्ञ के समान फलदायी कहा गया है।
2मत्स्यपुराण
दस हजार या अधिक तीर्थों की यात्रा का जो पुण्य मिलता है, उतना ही माघ मास में संगम स्नान से मिलता है।
3अग्निपुराण
प्रयागराज में प्रतिदिन स्नान का फल करोड़ों गोदान के बराबर है।
4पद्मपुराण
जो त्रिवेणी संगम पर स्नान करता है, उसे मोक्ष प्राप्त होती है।
त्रिवेणी का प्रतीकात्मक महत्व
गंगा, यमुना और सरस्वती क्रमशः ब्रह्मा, विष्णु और महेश का प्रतीक मानी जाती हैं। इन तीनों के संगम में स्नान से त्रिदेवों का आशीर्वाद प्राप्त होता है। योग परम्परा में ये तीन नदियाँ इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना नाड़ी का प्रतीक भी हैं, और उनका संगम आज्ञाचक्र में होता है।
स्नान की विधि
संगम में तीन डुबकी लगाई जाती है:
- ▸पहली: स्वयं के पाप नाश हेतु।
- ▸दूसरी: पितरों की आत्मा की शान्ति हेतु।
- ▸तीसरी: परिवार की सुख-समृद्धि हेतु।
विशेष अवसर
- ▸कुंभ/महाकुंभ: 12 वर्ष में एक बार (महाकुंभ 144 वर्ष में)। कुंभ का आधार खगोलीय — जब बृहस्पति वृषभ राशि में और सूर्य मकर राशि में हों।
- ▸माघ मेला: माघ मास में (जनवरी-फरवरी)।
- ▸मकर संक्रान्ति, मौनी अमावस्या, बसन्त पंचमी, माघ पूर्णिमा — ये विशेष स्नान तिथियाँ हैं।
पौराणिक कथा
समुद्र मंथन से प्राप्त अमृत कुम्भ से चार स्थानों पर अमृत की बूँदें गिरीं — प्रयाग, हरिद्वार, उज्जैन, नासिक। इसीलिए इन चार स्थानों पर कुंभ मेला लगता है।





