विस्तृत उत्तर
प्रयागराज को 'तीर्थराज' — अर्थात सभी तीर्थों का राजा — कहा जाता है। हिंदू धर्म में इसका स्थान सर्वोच्च तीर्थस्थलों में है।
पौराणिक महत्व: मत्स्य पुराण और पद्म पुराण के अनुसार, सृष्टि की रचना से पूर्व ब्रह्माजी ने इसी पावन भूमि पर प्रथम 'अश्वमेध यज्ञ' किया था। 'प्रयाग' का अर्थ है प्रथम (प्र) यज्ञ (याग) — इसीलिए यह नाम पड़ा। इस भूमि को आदि-प्रयाग भी कहते हैं।
त्रिवेणी संगम: यहाँ गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती का संगम होता है — यह त्रिवेणी विश्व में अद्वितीय है। ब्रह्मपुराण के अनुसार संगम स्नान का फल अश्वमेध यज्ञ के समान है। मत्स्य पुराण के अनुसार माघ मास में संगम स्नान से दस हजार तीर्थों की यात्रा का पुण्य मिलता है। पद्म पुराण में कहा गया है कि त्रिवेणी में स्नान से मोक्ष की प्राप्ति होती है।
कुंभ का कारण: समुद्र मंथन से प्राप्त अमृत कलश लेकर जब देवता 12 वर्षों तक असुरों से संघर्ष करते रहे, तब अमृत की कुछ बूंदें चार स्थानों — प्रयागराज, हरिद्वार, नासिक और उज्जैन — पर गिरीं। इसीलिए इन चारों स्थानों पर कुंभ मेला लगता है।
अक्षयवट: प्रयागराज में अक्षयवट का वृक्ष स्थित है जो अनादिकाल से है। मान्यता है कि प्रलय के बाद भी यह वृक्ष सुरक्षित रहा। इसके दर्शन मात्र से मोक्ष की प्राप्ति होती है। इसके अतिरिक्त पातालपुरी मंदिर, अलोपी देवी मंदिर, महर्षि भारद्वाज आश्रम जैसे स्थान भी प्रयागराज की पावनता में वृद्धि करते हैं।



