विस्तृत उत्तर
बालकाण्ड में प्रयाग तीर्थराज और माघ मेले का बड़ा महत्व बताया गया है। तुलसीदासजी ने संत-समाज की तुलना तीर्थराज प्रयाग से की।
चौपाई — 'मुद मंगलमय संत समाजू। जो जग जंगम तीरथराजू। राम भक्ति जहँ सुरसरि धारा। सरसइ ब्रह्म बिचार प्रचारा॥'
अर्थ — संतोंका समाज आनन्द और कल्याणमय है, जो जगतमें चलता-फिरता तीर्थराज (प्रयाग) है। जहाँ (उस संतसमाजरूपी प्रयागराजमें) रामभक्तिरूपी गंगाजीकी धारा है और ब्रह्मविचारका प्रचार सरस्वतीजी हैं।
इसमें प्रयाग की तीन नदियों की उपमा दी:
- ▸गंगा = रामभक्ति
- ▸सरस्वती = ब्रह्मविचार का प्रचार
- ▸यमुना = विधि-निषेधमय कर्मकथा जो कलियुग के पापों को हरने वाली है
साथ ही कहा — 'अकथ अलौकिक तीरथराऊ। देइ सद्य फल प्रगट प्रभाऊ॥' — वह तीर्थराज अलौकिक और अकथनीय है, तत्काल फल देनेवाला है।



