विस्तृत उत्तर
तिरुपति बालाजी मंदिर — जो आंध्र प्रदेश के चित्तूर जिले में तिरुमला पर्वत पर भगवान वेंकटेश्वर (विष्णु) को समर्पित है — में बाल चढ़ाना एक अत्यंत प्राचीन और विशेष परंपरा है। प्रतिदिन लगभग 20 हजार श्रद्धालु यहाँ अपने बाल दान करते हैं और हर वर्ष लगभग 500-600 टन बाल मंदिर को प्राप्त होते हैं।
पौराणिक कथा: प्राचीन काल में भगवान वेंकटेश्वर की मूर्ति पर चीटियों का एक बड़ा झुंड चढ़ गया था जो पर्वत जैसा दिखने लगा। उस पर एक गाय प्रतिदिन आकर स्वयं दूध देकर चली जाती थी। जब गाय के मालिक को पता चला तो क्रोध में उसने गाय पर कुल्हाड़ी से वार किया। इस आघात से भगवान वेंकटेश्वर के सिर पर भी चोट लग गई और उनके बाल झड़ गए। यह देखकर भगवान की माता नीला देवी ने अपने बाल काटकर भगवान के सिर पर लगा दिए, जिससे उनका घाव भर गया। भगवान वेंकटेश्वर इस निःस्वार्थ त्याग से अत्यंत प्रसन्न हुए और वरदान दिया कि 'आज से जो भी मेरे लिए अपने बालों का त्याग करेगा, उसकी सभी मनोकामनाएँ पूर्ण होंगी और माँ लक्ष्मी की कृपा सदैव उस पर बनी रहेगी।' तभी से यह परंपरा चली।
बाल दान का महत्व: हिंदू परंपरा में बाल शरीर का एक मूल्यवान अंग माना जाता है। इनका त्याग भगवान के प्रति समर्पण और अहंकार से मुक्ति का प्रतीक है। मान्यता है कि जो भक्त अपने बाल दान करते हैं, वे बालों के साथ-साथ अपने पाप और नकारात्मकता भी यहीं छोड़ जाते हैं। महिलाएँ विशेष मन्नत पूरी होने पर अपने लंबे बाल दान करती हैं।





