विस्तृत उत्तर
पुरी की जगन्नाथ रथयात्रा विश्व के सबसे प्राचीन और भव्य धार्मिक उत्सवों में से एक है। यह पर्व प्रत्येक वर्ष आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को आरंभ होता है।
पौराणिक इतिहास: पुरी के जगन्नाथ मंदिर की स्थापना का श्रेय राजा इंद्रद्युम्न को दिया जाता है। कथा के अनुसार, भगवान विष्णु के परम भक्त राजा इंद्रद्युम्न को स्वप्न में समुद्र में एक दिव्य काष्ठ खंड दिखा। नारद मुनि के निर्देशानुसार उस काष्ठ से मूर्ति निर्माण के लिए देवशिल्पी विश्वकर्मा बढ़ई के रूप में आए। उन्होंने शर्त रखी कि जब तक मूर्ति पूर्ण न हो, कोई भीतर न आए। महारानी ने अधिक प्रतीक्षा के कारण द्वार खोल दिया, और विश्वकर्मा मूर्ति अधूरी छोड़कर चले गए। यही कारण है कि आज भी जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की मूर्तियाँ अधूरी — बिना हाथ-पैरों के — हैं और प्रत्येक 12 वर्षों में नई मूर्तियाँ स्थापित की जाती हैं।
रथयात्रा का कारण: पद्म पुराण, स्कंद पुराण और ब्रह्म पुराण में रथयात्रा का उल्लेख मिलता है। सबसे प्रचलित कथा यह है कि एक दिन देवी सुभद्रा ने पुरी नगर के दर्शन की इच्छा प्रकट की। भगवान जगन्नाथ और बलभद्र ने अलग-अलग रथों पर बहन सुभद्रा को बिठाकर नगर भ्रमण कराया और अपनी 'मौसी' के घर गुंडीचा मंदिर में सात दिन रुके। इसी की स्मृति में रथयात्रा की परंपरा बनी।
ऐतिहासिक रूप से, वर्तमान विशाल मंदिर का निर्माण 12वीं शताब्दी में पूर्वी गंगा वंश के राजा अनंतवर्मन चोडगंग देव ने करवाया। स्कंद पुराण में कहा गया है कि रथयात्रा में जगन्नाथ जी का नाम कीर्तन करते हुए गुंडीचा तक जाने वाला पुनर्जन्म के बंधन से मुक्त हो जाता है। प्रत्येक वर्ष देश-विदेश से लाखों भक्त रथ खींचने का पुण्य लाभ प्राप्त करते हैं।





