विस्तृत उत्तर
गंगा स्नान का पुण्य शास्त्रों में अनन्त बताया गया है। गंगा को पुण्यसलिला, पापनाशिनी, मोक्षप्रदायिनी कहा गया है।
शास्त्रीय प्रमाण
1महाभारत (वनपर्व)
यद्यकार्यशतम् कृत्वा कृतम् गंगाभिषेचनम्। सर्व तत तस्य गंगाभ्यो दहत्यग्निरिवेन्धनम्॥
अर्थात् — सैकड़ों निषिद्ध कर्म करने के बाद भी गंगा स्नान से वे सभी पाप ऐसे नष्ट हो जाते हैं जैसे अग्नि ईंधन को जला देती है।
महाभारत में यह भी कहा गया:
सर्व कृतयुगे पुण्यम् त्रेतायां पुष्करं स्मृतम्। द्वापरेऽपि कुरुक्षेत्रं गंगा कलियुगे स्मृता॥
अर्थात् — सतयुग में सभी तीर्थ पुण्यदायी थे, त्रेतायुग में पुष्कर, द्वापर में कुरुक्षेत्र, और कलियुग में गंगा का विशेष महत्व है।
2अग्निपुराण
गंगा सद्गति प्रदान करने वाली हैं। नित्य गंगाजल सेवन करने वाला अपने वंश सहित भवबाधा से मुक्त होता है।
3पद्म पुराण
गंगा स्नान से सात पीढ़ियों का उद्धार होता है — 'अवगाढा च पीता च पुनात्यासप्तमं कुलम्'।
गंगा स्नान के पुण्य
- ▸नाम स्मरण मात्र से पाप नाश — 'गंगे तव दर्शनात् मुक्तिः'।
- ▸दर्शन से सौभाग्य प्राप्ति।
- ▸स्नान से सात पीढ़ियों का उद्धार।
- ▸गंगाजल पान से मोक्ष मार्ग प्रशस्त।
- ▸कलियुग में गंगा स्नान सर्वोत्तम पुण्यकर्म।
स्नान विधि (परम्परा अनुसार)
- ▸गंगा तट पर नंगे पैर जाएँ (वाहन दूर छोड़ें)।
- ▸गंगा माता की पूजा और आचमन करें।
- ▸संकल्प लेकर तीन बार डुबकी लगाएँ (त्रिलोकों का प्रतीक)।
- ▸गंगा में कुल्ला न करें, वस्त्र न धोएँ — यह अपमान माना जाता है।
- ▸स्नान के बाद दान-पुण्य करें।
विशेष तिथियाँ
गंगा दशहरा, मकर संक्रान्ति, कार्तिक पूर्णिमा, अमावस्या, पूर्णिमा, एकादशी आदि पर गंगा स्नान का विशेष पुण्य है।





