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विस्तृत उत्तर
प्रेत' शब्द संस्कृत के 'प्र' और 'इत' से बना है, जिसका शाब्दिक अर्थ है वह जीवात्मा जो भौतिक शरीर त्याग चुकी है, परंतु अभी तक उसे नई स्थूल योनि या पितृलोक की प्राप्ति नहीं हुई है। गरुड़ पुराण के अनुसार, प्रेत योनि में जीवात्मा को वायव्य प्रधान शरीर, अर्थात वायु तत्व से निर्मित देह, प्राप्त होता है। इस योनि की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जीवात्मा को अत्यंत तीव्र भूख और प्यास का अनुभव होता है, परंतु भौतिक शरीर के अभाव में वह कुछ भी ग्रहण करने में असमर्थ रहती है। वह घोर पीड़ा, असंतोष और अतृप्ति की अग्नि में जलती हुई मृत्युलोक पर भटकती रहती है।
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