विस्तृत उत्तर
गरुड़ पुराण के अनुसार, प्रेत योनि में जीवात्मा को वायव्य प्रधान शरीर प्राप्त होता है, जो वायु तत्व से निर्मित देह है। मृत्यु के पश्चात स्थूल शरीर नष्ट हो जाता है, परंतु मन, बुद्धि, अहंकार और पंचतन्मात्राओं से युक्त सूक्ष्म शरीर जीवित रहता है। प्रेत का कोई स्थूल भौतिक आकार नहीं होता, परंतु वह अपनी अपार मानसिक शक्ति से स्वप्न में या दृष्टि-भ्रम के माध्यम से विकृत रूप धारण कर सकता है। इसी सूक्ष्म, वायव्य शरीर में वह भूख-प्यास, असंतोष और अतृप्ति की पीड़ा अनुभव करता है।
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