विस्तृत उत्तर
शास्त्रों में तपोलोक की दूरी के भिन्न विवरण को विद्वान कल्प-भेद या ब्रह्मांड-भेद के रूप में समझते हैं। कल्प-भेद का अर्थ है विभिन्न कल्पों में सृष्टि की संरचनात्मक भिन्नता और ब्रह्मांड-भेद का अर्थ है अनंत ब्रह्मांडों में अलग-अलग परिमाण। सनातन दर्शन में अनंत ब्रह्मांडों की संकल्पना है और प्रत्येक कल्प में सृष्टि की संरचना में सूक्ष्म भिन्नताएँ उत्पन्न होना शास्त्रीय रूप से मान्य है। फिर भी सर्वाधिक मान्य और प्रचलित दूरी विष्णु पुराण और भागवत पुराण की मानी जाती है, जो तपोलोक को जनलोक से आठ करोड़ योजन दूर स्थापित करती है।
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