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विस्तृत उत्तर
प्राचीन काल में सपिण्डीकरण सामान्यतः एक वर्ष पूर्ण होने पर किया जाता था, क्योंकि मृतात्मा की 12 महीने की यात्रा का विधान माना गया था। किंतु कलियुग में शरीर की अनित्यता और जीवन की अस्थिरता को देखते हुए गरुड़ पुराण के वचनानुसार इसे अब 12वें दिन करने का विधान माना गया है। इस संस्कार से प्रेतात्मा प्रेत अवस्था से मुक्त होकर पितृ पद प्राप्त करती है।
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