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विस्तृत उत्तर
मृत्यु के अठारहवें दिन आत्मा वायु के वेग से चलते हुए सर्वप्रथम सौम्यपुर पहुँचती है। यहाँ उसे परिजनों द्वारा दिया गया प्रथम पिंड प्राप्त होता है। सौम्यपुर में आत्मा अपने पुराने सुखों और परिवार को याद करके रोती है। तब यमदूत उसे ताना मारते हैं कि उसका धन और परिवार कहाँ गया, अपने कर्मों का फल भोगो। यह प्रसंग यममार्ग की यात्रा में पिंडदान के महत्व और सांसारिक मोह के विच्छेदन को स्पष्ट करता है।
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