विस्तृत उत्तर
शिव पुराण के अनुसार, लिंगोद्भव कथा के पश्चात, उसी पावन दिन से भगवान शिव की लिंग रूप (निराकार प्रतीक) और मूर्ति रूप (साकार प्रतीक) दोनों रूपों में उपासना जगत में प्रारंभ हुई।
योग दर्शन के अनुसार, जब एक साधक अष्टांग योग के कठिन मार्ग से गुजरते हुए अपने प्राणों को संयमित करता है और मन को पूर्णतः मौन कर लेता है, तब वह लिंग स्वरूप शिव का साक्षात्कार अपने भीतर ही करता है।
महाभारत के अनुशासन पर्व में महर्षि उपमन्यु बताते हैं कि संपूर्ण चराचर जगत 'भग' (स्त्रीलिंग चिह्न) और 'लिंग' (पुल्लिंग चिह्न) के चिह्न से युक्त है।





