विस्तृत उत्तर
संहारकर्ता होने के साथ-साथ शिव परम तपस्वी और 'आदियोगी' हैं। वेदों और उपनिषदों में उन्हें 'महायशा:', 'तपस्वी', 'भूत भावन', 'महातपा' और 'योगी' कहकर उनकी वंदना की गई है।
शैव दर्शन में शिव को शुद्ध चेतना माना गया है। योग दर्शन के अनुसार, जब एक साधक अष्टांग योग (यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि) के कठिन मार्ग से गुजरते हुए अपने प्राणों को संयमित करता है और मन को पूर्णतः मौन कर लेता है, तब वह लिंग स्वरूप शिव का साक्षात्कार अपने भीतर ही करता है।
उस अवस्था में शिव कोई बाहरी देवता नहीं रह जाते, अपितु वे साधक की अपनी ही परम चेतना बन जाते हैं, जिसे वेदों ने सच्चिदानंद और उपनिषदों ने परब्रह्म कहा है।





