विस्तृत उत्तर
रहस्यमयी यौगिक सिद्धियों और अष्टांग योग के अभ्यास से सिद्ध योगी जन स्वेच्छा से अपने प्राणों को ब्रह्माण्ड के ऊर्ध्व लोकों (महर्लोक, जनलोक, तपोलोक) में ले जा सकते हैं। श्रीमद्भागवत (११.२४.१४) स्पष्ट करता है कि अष्टांग योग, महान तपस्या और संन्यास के माध्यम से इन ऊर्ध्व लोकों को प्राप्त किया जा सकता है। योग के माध्यम से साधक अपनी चेतना को इतना परिष्कृत कर लेता है कि वह भौतिक शरीर की सीमाओं को लांघकर ऊर्ध्व लोकों में जा सकता है। यह केवल उन महान सिद्धों का कार्य है जो अपनी तपोबल से प्राप्त अणिमा-गरिमा आदि अष्ट-सिद्धियों के प्रभाव से ब्रह्माण्ड के किसी भी लोक में मन की गति से विचरण करने की क्षमता रखते हैं। गरुड़ पुराण में भी कुंडलिनी जागरण और विशुद्ध चक्र को जाग्रत करके महर्लोक की उच्च चेतना तक पहुँचने का संकेत मिलता है।
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