विस्तृत उत्तर
कर्म मार्ग और राज मार्ग — मोक्ष के दो प्रमुख पथ हैं जो सक्रिय साधना पर आधारित हैं।
कर्म मार्ग (कर्म योग) — गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने इसकी सबसे विस्तृत व्याख्या की है। इसमें साधक सांसारिक कर्तव्यों को पूरा करते हुए मुक्ति की ओर बढ़ता है। सूत्र है — फल की इच्छा छोड़कर, अहंकार रहित होकर, केवल कर्तव्य की भावना से कर्म करो। जब कोई यज्ञ भावना से, समाज की सेवा की भावना से काम करता है — तो वह कर्म मोक्ष का साधन बन जाता है। राजा जनक इसका आदर्श उदाहरण हैं जो राज्य चलाते हुए भी जीवनमुक्त थे।
राज मार्ग (राज योग / अष्टांग योग) — महर्षि पतंजलि के योगसूत्रों में इसका विस्तृत विवरण मिलता है। इसमें चित्त की वृत्तियों को रोककर समाधि की प्राप्ति लक्ष्य है। इसके आठ अंग हैं — यम (नैतिक नियम), नियम (व्यक्तिगत अनुशासन), आसन (शरीर की स्थिरता), प्राणायाम (श्वास नियंत्रण), प्रत्याहार (इंद्रियों को अंदर मोड़ना), धारणा (एकाग्रता), ध्यान (निरंतर चिंतन) और समाधि (चेतना की पूर्णता)। यह मार्ग अत्यंत अनुशासन, गुरु-मार्गदर्शन और धैर्य की माँग करता है।
दोनों में अंतर — कर्म मार्ग बाहरी जगत में रहते हुए मुक्ति देता है; राज मार्ग अंतःकरण को साधकर आत्म-साक्षात्कार तक ले जाता है। दोनों मिलकर एक पूर्ण साधक का निर्माण करते हैं।





