विस्तृत उत्तर
धारणा, ध्यान और समाधि अष्टांग योग के अंतिम तीन अंग हैं जिन्हें पतंजलि ने 'संयम' (योगसूत्र 3.4) कहा। तंत्र में भी यही क्रम है, किन्तु विधि भिन्न हो सकती है।
क्रम और अंतर
1धारणा (Concentration)
- ▸'देशबन्धश्चित्तस्य धारणा।' (योगसूत्र 3.1) — चित्त को एक स्थान (देश) पर बाँधना।
- ▸तंत्र में: मन को चक्र, बीज मंत्र, यंत्र, या देवता मूर्ति पर केन्द्रित करना।
- ▸उदा: हृदय चक्र पर 'ॐ' का ध्यान, या आज्ञा चक्र पर ज्योति का ध्यान।
- ▸अवधि: आरम्भ में कुछ सेकण्ड-मिनट।
2ध्यान (Meditation)
- ▸'तत्र प्रत्ययैकतानता ध्यानम्।' (योगसूत्र 3.2) — उसी विषय पर निरंतर एकाग्र प्रवाह।
- ▸धारणा जब निरंतर (unbroken flow) हो जाए = ध्यान।
- ▸तंत्र में: देवता/मंत्र/चक्र पर एकाग्रता इतनी गहरी कि बाहरी संसार विस्मृत।
- ▸अवधि: कई मिनट-घण्टे।
3समाधि (Absorption)
- ▸'तदेवार्थमात्रनिर्भासं स्वरूपशून्यमिव समाधिः।' (योगसूत्र 3.3) — ध्यान इतना गहरा कि ध्याता (साधक) और ध्येय (देवता/मंत्र) का भेद मिट जाए।
- ▸तंत्र में: शिव-शक्ति एकता का अनुभव। 'अहं ब्रह्मास्मि' — 'मैं = ब्रह्म' की प्रत्यक्ष अनुभूति।
- ▸सविकल्प समाधि: थोड़ा द्वैत शेष। निर्विकल्प समाधि: पूर्ण अद्वैत — सर्वोच्च।
संक्षेप: धारणा = मन बाँधना, ध्यान = मन बहना, समाधि = मन लीन होना। तीनों मिलकर = 'संयम' = सिद्धि प्राप्ति।
तंत्र की विशेषता: योग सूत्र में समाधि = निर्गुण ब्रह्म में लय। तंत्र में समाधि = शिव-शक्ति एकता + भोग और मोक्ष दोनों। तंत्र भोग को त्याज्य नहीं, उपयोगी मानता है।