विस्तृत उत्तर
शिव के तृतीय नेत्र का महत्व शिव पुराण और लिंग पुराण में वर्णित है:
तृतीय नेत्र का शास्त्रीय परिचय
शिव का तीसरा नेत्र उनके भ्रूमध्य (दोनों भौंहों के बीच) में स्थित है। यह 'ज्ञान नेत्र' या 'अग्नि नेत्र' कहलाता है।
पौराणिक घटना — कामदेव दहन
शिव पुराण में वर्णित है — देवताओं ने तारकासुर के वध के लिए शिव-पार्वती विवाह आवश्यक था। कामदेव को भेजा गया कि वे ध्यानस्थ शिव में काम-भाव जागृत करें। कामदेव ने पुष्प बाण चलाया। शिव का ध्यान भंग हुआ — उन्होंने क्रोध में तृतीय नेत्र खोला। उस अग्नि से कामदेव भस्म हो गए।
तृतीय नेत्र के प्रतीकात्मक अर्थ
- 1ज्ञान का प्रतीक:
दो भौतिक नेत्र — दाहिना (सूर्य) और बाया (चंद्र) — भौतिक जगत देखते हैं। तीसरा नेत्र = ज्ञान नेत्र — जो सत्य, परम और अदृश्य देखता है।
- 1काम पर विजय:
कामदेव दहन का प्रतीकार्थ — तीसरा नेत्र जागृत होने पर काम (वासना), क्रोध (तृतीय नेत्र की आग) सब भस्म हो जाते हैं।
- 1आज्ञाचक्र:
तंत्र शास्त्र में तृतीय नेत्र = आज्ञाचक्र (Ajna Chakra) — षष्ठ ऊर्जा केंद्र। यहाँ 'ॐ' का निवास माना गया है। इसके जागृत होने पर योगी सर्वज्ञ हो जाता है।
- 1भस्म का प्रतीक:
शिव सर्वांग भस्म लगाते हैं — तृतीय नेत्र की अग्नि से सब कुछ भस्म होता है और फिर नई सृष्टि। यह विनाश और पुनर्निर्माण का चक्र है।
त्रिपुंड का संबंध
भस्म के त्रिपुंड (तीन रेखाएं) शिव के तीन नेत्रों, त्रिदेव, त्रिगुण और त्रिकाल — सभी के प्रतीक हैं।





