विस्तृत उत्तर
शिवलिंग की परिक्रमा पूरी गोलाकार नहीं, बल्कि अर्धचंद्राकार (आधी) की जाती है। इसके पीछे शास्त्रसम्मत कारण इस प्रकार हैं:
मूल सिद्धांत — सोमसूत्र (जलधारी) को लांघना वर्जित
शिवलिंग पर अभिषेक का जल जिस मार्ग से बाहर निकलता है, उसे 'सोमसूत्र', 'निर्मली' या 'जलधारी' कहते हैं। शास्त्रों का स्पष्ट आदेश है:
'अर्द्ध सोमसूत्रान्तमित्यर्थः शिव प्रदक्षिणीकुर्वन् सोमसूत्रं न लंघयेत्'
— अर्थात् शिवलिंग की प्रदक्षिणा सोमसूत्र तक ही करें, उसे कभी न लांघें।
कारण 1 — शिव-शक्ति की सम्मिलित ऊर्जा
शिवलिंग का ऊपरी भाग शिव (पुरुष तत्त्व) और निचला भाग (योनि/पीठिका) शक्ति (स्त्री तत्त्व) का प्रतीक है। अभिषेक जल में शिव-शक्ति दोनों की ऊर्जा समाहित हो जाती है। सोमसूत्र से प्रवाहित जल अत्यंत ऊर्जावान होता है। इसे लांघने से शरीर पर, विशेषतः प्रजनन संबंधी स्वास्थ्य पर, विपरीत प्रभाव पड़ सकता है।
कारण 2 — शिव आदि-अनंत हैं
शिवपुराण के अनुसार शिव 'आदि' और 'अनंत' दोनों हैं — उनका न कोई आरंभ है, न अंत। सोमसूत्र से बहने वाली ऊर्जा भी अनंत है, इसलिए उसके मार्ग को अवरुद्ध या लांघना उचित नहीं।
कारण 3 — वायु प्रवाह पर प्रभाव
सोमसूत्र के शक्ति-स्रोत को लांघने से शरीर की पंच प्राण वायुओं, विशेषतः देवदत्त और धनंजय वायु के प्रवाह में रुकावट होती है।
परिक्रमा की सही विधि
- 1शिवलिंग की बाईं ओर से परिक्रमा आरंभ करें।
- 2जलधारी/सोमसूत्र तक पहुंचकर रुकें।
- 3वहीं से विपरीत दिशा में लौटें।
- 4दूसरी ओर से फिर जलधारी तक आएं।
- 5इस प्रकार चंद्राकार (अर्ध चंद्र) आकार बनता है।
ध्यान रखें
- ▸शिव की मूर्ति (प्रतिमा) की पूरी परिक्रमा की जा सकती है, किन्तु शिवलिंग की केवल अर्धचंद्राकार परिक्रमा ही करें।
- ▸जलधारी को कभी भी — चाहे भूलवश भी — न लांघें।
- ▸परिक्रमा सदैव बाईं ओर से आरंभ करें, दाईं ओर से नहीं।





