विस्तृत उत्तर
शिव पुराण और लिंग पुराण के अनुसार शिवलिंग पर जल अर्पण की विधि अत्यंत महत्वपूर्ण है।
जल अर्पण के नियम
- 1जल का प्रकार: गंगाजल सर्वश्रेष्ठ है। इसके अभाव में स्वच्छ नदी जल, वर्षा जल या सामान्य शुद्ध जल उपयोग करें।
- 1पात्र: तांबे के लोटे से जल चढ़ाना शुभ है। लोहे का पात्र वर्जित है।
- 1दिशा: शिवलिंग के सामने (उत्तर या पूर्व दिशा) खड़े होकर जल अर्पित करें।
- 1धारा: जल की धारा निरंतर व मध्यम गति से चढ़ाएं — न अत्यधिक तेज, न बूंद-बूंद।
- 1मंत्र: जल अर्पण करते समय 'ॐ नमः शिवाय' या 'ॐ जलधाराभिषेकेण शिवं प्रीणामि' बोलें।
- 1सोमवार विशेष: सोमवार को जलाभिषेक का विशेष महत्व है — इस दिन प्रातःकाल जल चढ़ाने से शिव प्रसन्न होते हैं।
- 1प्रतिबंध: शिवलिंग के सामने से (जलहरी के मुख की ओर से) जल न लांघें — यह अपवित्र माना जाता है।
- 1जलहरी का सम्मान: जल हमेशा जलहरी (योनिपीठ) के मुख की दिशा में बहना चाहिए — इसे न लांघें, बल्कि बाईं ओर से प्रदक्षिणा करें (आधी परिक्रमा)।
वैज्ञानिक महत्व: जलाभिषेक से शिवलिंग की ऊर्जा संतुलित रहती है और वातावरण शुद्ध होता है।





