विस्तृत उत्तर
शिवलिंग पर जल चढ़ाने की विधि शिव पुराण और स्कंद पुराण में वर्णित है:
जलाभिषेक का महत्व
शिव पुराण में कहा गया है कि शिव की सबसे प्रिय पूजा जलाभिषेक है। शिव 'आशुतोष' हैं — शीघ्र प्रसन्न होने वाले। जो केवल जल चढ़ाता है, उस पर भी शिव प्रसन्न होते हैं।
जल के प्रकार (श्रेष्ठता क्रम)
- 1गंगाजल — सर्वोत्तम
- 2नर्मदा, यमुना का जल
- 3किसी पवित्र नदी का जल
- 4कुएं या स्वच्छ स्रोत का जल
- 5साधारण शुद्ध जल — यह भी स्वीकार्य है
जलाभिषेक की सही विधि
- 1पात्र: तांबे के पात्र (लोटे) से जल चढ़ाएं — तांबा शुद्ध और शुभ माना गया है
- 2धारा: पतली, निरंतर धारा से जल चढ़ाएं — एक साथ बहुत अधिक जल न डालें
- 3मंत्र: जल चढ़ाते समय 'ॐ नमः शिवाय' या 'ॐ नमो भगवते रुद्राय' का जप करें
- 4दिशा: शिवलिंग के उत्तर या पूर्व की ओर खड़े होकर अभिषेक करें
विशेष नियम — सोमसूत्र
शिवलिंग की जलाधारी (जल निकासी नाली) को 'सोमसूत्र' कहते हैं। परिक्रमा करते समय इसे लांघना नहीं चाहिए — इसी कारण शिवलिंग की परिक्रमा अर्धचंद्राकार (आधी) होती है।
वर्जित जल
- ▸केतकी (केवड़ा) के फूल मिला जल — परंपरागत रूप से वर्जित
- ▸बासी जल
- ▸नाली या अशुद्ध स्रोत का जल
जलाभिषेक के शुभ समय
- ▸सोमवार प्रातःकाल
- ▸महाशिवरात्रि
- ▸श्रावण मास — प्रतिदिन
- ▸प्रदोष काल (त्रयोदशी)
श्रावण और जलाभिषेक
श्रावण मास में शिवलिंग पर जल चढ़ाना सर्वाधिक पुण्यकारी माना गया है। कांवड़ यात्रा इसी परंपरा का हिस्सा है — गंगाजल लाकर शिवलिंग पर चढ़ाना।





