विस्तृत उत्तर
शिवलिंग पर कर्पूर (कपूर) जलाना शिव पूजा का अत्यंत महत्वपूर्ण अंग है। शिव पुराण के अनुसार बिना कर्पूर के शिव आरती अधूरी मानी गई है।
आध्यात्मिक अर्थ
1अहंकार का पूर्ण विसर्जन
कर्पूर का सबसे गहरा प्रतीकात्मक अर्थ यह है कि जिस प्रकार कपूर जलकर बिना कोई अवशेष छोड़े पूर्णतः विलीन हो जाता है, उसी प्रकार साधक को अपना अहंकार शिव के समक्ष पूर्णतः समर्पित कर देना चाहिए — कोई शेष न बचे।
2'कर्पूरगौरं' — शिव का स्वरूप
शिव स्तुति मंत्र 'कर्पूरगौरं करुणावतारं...' में शिव को कर्पूर के समान श्वेत और उज्ज्वल बताया गया है। कर्पूर जलाना शिव की श्वेत, निर्मल ज्योति का स्मरण है।
3अज्ञान का नाश
कर्पूर की ज्योति अंधकार (अज्ञान) का नाश करती है और प्रकाश (ज्ञान) फैलाती है। शिवलिंग पर कर्पूर जलाना = अज्ञान से ज्ञान की ओर गमन।
4वातावरण शुद्धि
स्कन्द पुराण के अनुसार कर्पूर जलाने से 108 यज्ञों का फल प्राप्त होता है। कर्पूर की सुगंध नकारात्मक ऊर्जा का नाश करती है और दिव्य वातावरण का निर्माण करती है।
5जीवात्मा-परमात्मा मिलन
कर्पूर का अग्नि में विलीन होना जीवात्मा का परमात्मा (शिव) में विलय होने का प्रतीक है — यही मोक्ष है।
विधि
- ▸शुद्ध कर्पूर (एडिबल/पूजा ग्रेड) ही प्रयोग करें।
- ▸कर्पूर शिवलिंग के समक्ष या तांबे/पीतल की थाली में जलाएं।
- ▸आरती करते समय 'ॐ जय शिव ओंकारा' या 'कर्पूरगौरं करुणावतारं' मंत्र का जप करें।
- ▸कर्पूर की ज्योति के ऊपर हाथ रखकर माथे और आंखों को स्पर्श करें — इससे दिव्य शक्ति शरीर में प्रवेश करती है।
वैज्ञानिक पक्ष
कर्पूर में एंटीसेप्टिक और वायु शुद्धिकारक गुण हैं। इसकी सुगंध मन को शांत करती है और एकाग्रता बढ़ाती है।





