विस्तृत उत्तर
नारद जी के अनुसार इन्द्र की यह तेजोमयी दिव्य सभा सूर्य के समान प्रकाशित होती है। इस सभा की भौतिक विमाएं अत्यंत विशाल हैं। इसकी लंबाई डेढ़ सौ (150) योजन, चौड़ाई सौ (100) योजन और ऊँचाई पाँच (5) योजन है। यह सभा कोई पृथ्वी के भवनों के समान स्थिर संरचना नहीं है बल्कि यह एक 'काम-गामिनी' संरचना है जो इच्छा के अनुसार आकाश में तीव्र या मंद गति से विचरण कर सकती है। इसके भीतर प्रवेश करते ही शोक, जरा, थकान, मानसिक चिंता और भय का पूर्णतः नाश हो जाता है। इस सुधर्मा सभा में सर्वश्रेष्ठ सुवर्ण-सिंहासन पर देवराज इन्द्र अपनी अर्धांगिनी शची के साथ विराजमान होते हैं। यह महाभारत के सभा पर्व अध्याय 7 में देवर्षि नारद द्वारा वर्णित है।
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