विस्तृत उत्तर
मेरु पर्वत के सर्वोच्च शिखर पर साक्षात् परमेष्ठी ब्रह्मा जी की स्वर्णमयी पुरी (नगर) स्थित है जिसे 'ब्रह्मपुरी' या 'शातकौम्भी' कहा जाता है। मार्कण्डेय पुराण और विष्णु पुराण के अनुसार यह ब्रह्मपुरी चौकोर है और दस हजार योजन विस्तृत है। इस शातकौम्भी पुरी को चारों ओर से आठ लोकपालों (अष्ट-दिक्पालों) की स्वर्ण और मणियों से निर्मित नगरियों ने घेर रखा है। ये आठ लोकपाल हैं — देवराज इन्द्र, अग्नि, यम, वरुण, वायु, कुबेर, ईश और निर्ऋति। देवनदी गंगा भी स्वर्गीय लोकों से आकर सर्वप्रथम इसी ब्रह्मपुरी में अवतरित होती है और यहाँ से चार धाराओं में विभक्त होकर चारों दिशाओं में प्रवाहित होती है। इस प्रकार मेरु पर्वत का शिखर देव-नगरियों का केंद्र और ब्रह्माण्ड का सर्वोच्च सुलभ बिंदु है।
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