विस्तृत उत्तर
सुतल लोक का पूरा महत्व यह है कि यह भगवान विष्णु की अहैतुकी कृपा, भक्त की चरम शरणागति और धर्म की सर्वोच्चता का सजीव और शाश्वत प्रमाण है। यह पृथ्वी के धरातल से तीस हजार योजन नीचे स्थित तीसरा अधोलोक है, पर यह अंधकारमय नरक नहीं है। यह बिल-स्वर्ग है, जहाँ भौतिक ऐश्वर्य, सुख-सुविधाएँ, प्राकृतिक सौंदर्य और विलासिता स्वर्ग से भी अधिक उन्नत और समृद्ध बताई गई हैं। इसका निर्माण भगवान वामन की आज्ञा से देव-वास्तुकार विश्वकर्मा ने महाराजा बलि के निवास के लिए किया। यहाँ के महल स्वर्ण, स्फटिक, नीलम, पन्ने और दिव्य रत्नों से जड़े हैं, नदियाँ और सरोवर पवित्र हैं, और नागों की मणियों के प्रकाश से अंधकार नहीं रहता। यहाँ दिव्य औषधियों और रसायनों के कारण बुढ़ापा, रोग, थकान और दुर्गंध जैसी लौकिक व्याधियाँ नहीं सतातीं। सुतल लोक के संप्रभु शासक विरोचन-पुत्र और प्रह्लाद-पौत्र महाराजा बलि हैं, जो भविष्य के सावर्णि मन्वंतर में इंद्र बनेंगे। सुतल की सबसे बड़ी विशेषता इसका ऐश्वर्य नहीं, बल्कि यह है कि साक्षात् अखिल-जगद्-गुरु भगवान नारायण चतुर्भुज गदापाणि रूप में इसके द्वार पर रक्षक के रूप में अहर्निश खड़े हैं। रावण जैसे त्रिलोक-विजेता का अंगूठे मात्र से दर्प-भंग करना सिद्ध करता है कि सुतल लोक अभेद्य और परम पवित्र बिल-स्वर्ग है। चौदह लोकों के संपूर्ण विज्ञान में सुतल लोक वैराग्य, सत्यनिष्ठा, गुरु-भक्ति से ऊपर ईश्वर-भक्ति और भगवान की असीम कृपा का सर्वोच्च प्रतिमान है।
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