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विस्तृत उत्तर
स्वर्ण की चोरी पाँच महापातकों में गिनी गई है, विशेष रूप से देव-मंदिर, ब्राह्मण या किसी असहाय का स्वर्ण चुराना। ऐसा पापी 'कुम्भीपाक' नरक में उबलते हुए तेल में पकाया जाता है। नरक की भयंकर यातना के पश्चात यह पापी जीव प्रेत योनि में आता है। इस प्रकार स्वर्ण चोरी का फल पहले नरक दंड और बाद में प्रेत अवस्था के रूप में बताया गया है।
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