विस्तृत उत्तर
सनातन शास्त्रों का सिद्धांत है 'यथा पिण्डे तथा ब्रह्माण्डे', अर्थात जो ब्रह्मांड में है वही शरीर में है। तपोलोक का वर्णन केवल बाह्य अंतरिक्ष के एक लोक के रूप में नहीं, बल्कि मनुष्य की आंतरिक चेतना के एक चक्र और शारीरिक स्थान के रूप में भी किया गया है। गरुड़ पुराण तपोलोक को मनुष्य के ललाट पर बताता है। योगोपनिषदों और तांत्रिक शास्त्रों के अनुसार यह भ्रूमध्य स्थित आज्ञा चक्र से जुड़ा है, जहाँ योगी ध्यान के समय अपनी प्राण ऊर्जा और चित्त-वृत्ति को एकाग्र करता है। इस प्रकार बाहरी तपोलोक तक पहुँचने की यात्रा भीतर मूलाधार से आज्ञा चक्र तक पहुँचने की योगिक यात्रा से जुड़ती है।
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