विस्तृत उत्तर
दस्तावेज़ में कहा गया है कि यद्यपि वैराज देवगण तपोलोक में निवास करते हैं और सांसारिक बंधनों से पूर्णतः मुक्त हैं, फिर भी कल्प के आरंभ में सृष्टि के विस्तार, वंशावली के निर्माण और लोक-मर्यादा के रक्षण हेतु परमेश्वर की इच्छा से वे प्रजापतियों के रूप में अवतीर्ण होकर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष योगदान देते हैं। ब्रह्मांड पुराण और वायु पुराण में वैराज प्रजापति, उनकी कन्या नद्वला, चाक्षुष मनु से उसका विवाह और आगे राजा पृथु तक की वंशावली का वर्णन इसी बात को सिद्ध करता है। तपोलोक की सत्ता सृष्टि के आरंभ और विकास से गूढ़ रूप से जुड़ी हुई है।
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