विस्तृत उत्तर
तारा देवी साधना — वाक्-सिद्धि और नवग्रह-रक्षण की देवी:
तारा देवी का परिचय
दशमहाविद्याओं में द्वितीय। तारा = 'तारने वाली' — संकट से पार लगाने वाली। ये 'नीलसरस्वती' भी कहलाती हैं — विद्या और वाणी की देवी। बौद्ध-तंत्र में 'तारा' बोधिसत्व के रूप में भी।
तारा के तीन रूप (तंत्रसार)
- 1एकजटा — जटाधारिणी, उग्र
- 2नीलसरस्वती — विद्या, वाणी, संगीत
- 3उग्रतारा — शत्रु-नाश और रक्षा
तारा-साधना की विधि
1मंत्र
- ▸मूल बीज: 'त्रीं'
- ▸एकजटा मंत्र: 'ॐ त्रीं ह्रीं ह्रूं तारायै स्वाहा'
- ▸नीलसरस्वती: 'ॐ ह्रीं त्रीं हूं फट्' — वाक्-सिद्धि के लिए
2काल
- ▸मंगलवार या शनिवार
- ▸अमावस्या और अष्टमी
- ▸रात्रि-काल
3वस्त्र
- ▸नीले वस्त्र — सर्वोत्तम
- ▸काला भी स्वीकार्य
4ध्यान-स्वरूप (तारा तंत्र)
नीलवर्णा, एकजटा (एक मुकुट), त्रिनेत्र, खड्ग-कैंची-नीलकमल-खप्पर-धारिणी, श्वेत शिव पर आसीन — तारा का ध्यान।
5यंत्र
तारा यंत्र — अष्टकोण में तारा।
6भोग
नीलकमल, तिल, खिचड़ी। तारा तंत्र: मछली — वामाचार में (गुरु-मार्गदर्शन में)।
7पुरश्चरण
त्रीं' (1 अक्षर) = 1 लाख। 'ॐ त्रीं ह्रीं ह्रूं तारायै स्वाहा' = अक्षर-संख्या × 1 लाख।
तारा-सिद्धि के फल (महाचीन क्रम)
- ▸वाक्-सिद्धि — वाणी प्रभावशाली
- ▸विदेश-यात्रा में रक्षा (तारा = 'तारिणी' — नौका जैसे पार लगाना)
- ▸लेखन और वक्तृत्व में उत्कर्ष
- ▸नौ विपदाओं से रक्षा
