विस्तृत उत्तर
तंत्र में ध्यान की अनिवार्यता का वर्णन तंत्रालोक और कुलार्णव तंत्र में मिलता है:
तंत्रालोक का दृष्टिकोण
तंत्र में मंत्र + पूजा + ध्यान = त्रिवेणी। तीनों मिलकर पूर्ण साधना बनाती है। ध्यान के बिना मंत्र जप यांत्रिक — शक्ति सीमित।
ध्यान क्यों जरूरी — पाँच कारण
1शक्ति का निर्देशन
मंत्र ऊर्जा उत्पन्न करता है — ध्यान उसे सही दिशा में निर्देशित करता है। बिना ध्यान के ऊर्जा बिखर जाती है।
2देवता की उपस्थिति
ध्यान में इष्ट देव का स्वरूप = देवता को साधना में आमंत्रित करना। विज्ञान भैरव: 'जो ध्यान में है, वही सत्य में है।'
3मन का एकत्रीकरण
तंत्र में मन = शक्ति का माध्यम। बिखरा मन = बिखरी शक्ति। ध्यान = मन को एक बिंदु पर लाना।
4कुंडलिनी का उचित जागरण
कुलार्णव: ध्यान के बिना कुंडलिनी जागरण असंतुलित। ध्यान = कुंडलिनी को नियंत्रित मार्ग।
5सिद्धि का द्वार
तंत्र में सिद्धि = ध्यान में देव दर्शन। जप और पूजा रास्ता हैं — ध्यान मंजिल।
सरलतम ध्यान
भगवान मेरे सामने हैं, मुझे देख रहे हैं।' — यह भाव ही ध्यान की नींव।





