विस्तृत उत्तर
वास्तु शास्त्र में रसोई और अग्नि स्रोत की दिशा का विशेष महत्व है। प्राचीन ग्रंथों में चूल्हे (अग्नि स्थान) की दिशा का स्पष्ट विधान है, जो आधुनिक गैस स्टोव/चूल्हे पर भी लागू होता है।
गैस/चूल्हा रखने की सर्वश्रेष्ठ दिशा
- 1आग्नेय कोण (दक्षिण-पूर्व) — सर्वोत्तम। यह अग्नि तत्व की दिशा है। रसोई स्वयं भी इसी कोण में होनी चाहिए और गैस भी इसी दिशा में रखें।
- 1खाना बनाने वाले का मुख — पूर्व दिशा की ओर होना चाहिए। इसका अर्थ है कि गैस ऐसे रखें कि खाना बनाते समय मुख पूर्व की ओर हो।
अन्य स्वीकार्य विकल्प
- ▸यदि आग्नेय कोण संभव न हो तो दक्षिण दीवार की ओर मुख करके गैस रखना भी स्वीकार्य है।
किस दिशा में न रखें
- 1ईशान कोण (उत्तर-पूर्व) — जल तत्व की दिशा, अग्नि से विरोध। सबसे बड़ा दोष।
- 2उत्तर दिशा — कुबेर की दिशा, यहां अग्नि धन हानि का कारण माना जाता है।
- 3खिड़की/दरवाजे के ठीक सामने — हवा से अग्नि अस्थिर होती है, व्यावहारिक और वास्तु दोनों दृष्टि से अनुचित।
अन्य रसोई वास्तु नियम
- ▸पानी का स्रोत (सिंक, RO) और गैस एक ही प्लेटफॉर्म पर एक-दूसरे के बगल में न रखें — अग्नि और जल विरोधी तत्व हैं। बीच में कुछ दूरी रखें।
- ▸गैस के ऊपर शीशा/दर्पण न हो।
- ▸रसोई का दरवाजा पूर्व, उत्तर या पश्चिम में हो।
- ▸काला रंग रसोई में वर्जित माना जाता है।





