विस्तृत उत्तर
वसु-रुद्र-आदित्य पितृ विज्ञान से यह शिक्षा मिलती है कि श्राद्ध कोई अंधविश्वास, रूढ़िवाद या केवल भावनात्मक स्मृति-समारोह नहीं है, बल्कि एक सुस्पष्ट, गणितीय और ब्रह्माण्डीय कर्मकाण्डीय तंत्र है। इसका जैविक आधार यह है कि यजमान के शरीर में ८४ अंशों में से ४६ अंश सीधे ऊपर की तीन पीढ़ियों से जुड़े हैं, इसलिए उनका पितृ ऋण सर्वाधिक है। इसका कर्मकाण्डीय आधार सपिण्डीकरण है, जो प्रेत को पितृ मण्डल में स्थापित कर वसु, रुद्र और आदित्य की क्रमिक पदोन्नति देता है। इसका पारलौकिक आधार यह है कि वसु, रुद्र और आदित्य श्राद्ध देवता के रूप में हविष्य को पितर की वर्तमान योनि के अनुसार अमृत, भोग, तृण या वायु में रूपांतरित करते हैं। इसका आध्यात्मिक आधार यह है कि वसु भौतिक तत्त्व, रुद्र प्राण तत्त्व और आदित्य प्रकाश तथा मोक्ष तत्त्व की ओर जीव की यात्रा का प्रतीक हैं। इसलिए जब यजमान श्रद्धा से अपने पिता को वसुरूप कहकर तर्पित करता है, तो वह अपने पूर्वजों को ब्रह्माण्डीय शक्तियों के साथ एकाकार करता है।
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