विस्तृत उत्तर
वसु, रुद्र और आदित्य में मुख्य अंतर उनके कार्य और पितृ अवस्था के स्तर से समझा जाता है। वसु पञ्चमहाभूत और दिशाओं के धारक हैं तथा प्रथम पितृ अवस्था, यानी स्थूलता और निकटतम भौतिक संबंध, का प्रतीक हैं। रुद्र प्राण का संचार और पापों का दहन करते हैं तथा द्वितीय पितृ अवस्था, यानी सूक्ष्म प्राणिक अवस्था, के प्रतीक हैं। आदित्य कालचक्र, प्रकाश और सत्य के नियामक हैं तथा तृतीय पितृ अवस्था, यानी परम प्रकाशमय और मोक्षोन्मुखी अवस्था, के सूचक हैं। श्राद्ध में पिता वसु, पितामह रुद्र और प्रपितामह आदित्य रूप में पूजे जाते हैं।
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