विस्तृत उत्तर
वेदोक्त विधि से पूजा का अर्थ है वेद मंत्रों और वैदिक कर्मकांड के अनुसार देवताओं का पूजन करना। यह पूजा पद्धति सबसे प्राचीन और प्रामाणिक मानी जाती है।
वेदोक्त पूजा के प्रमुख चरण
1आत्म शुद्धि
स्नान → शुद्ध वस्त्र → आचमन (तीन बार जल ग्रहण — 'ॐ अमृतोपस्तरणमसि स्वाहा') → शिखा बन्धन → प्राणायाम (ॐ भूः, ॐ भुवः, ॐ स्वः सहित गायत्री मंत्र)।
2संकल्प
देश-काल-पात्र का उल्लेख करते हुए पूजा का उद्देश्य और संकल्प लें।
3षोडशोपचार पूजन (16 उपचार)
आवाहन, आसन, पाद्य, अर्घ्य, आचमनीय, स्नान, वस्त्र, उपवीत, गन्ध (चन्दन), पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, ताम्बूल, दक्षिणा, प्रदक्षिणा-नमस्कार। प्रत्येक उपचार वैदिक मंत्रों (पुरुषसूक्त के 16 मंत्र या रुद्रसूक्त के 16 मंत्र) से किया जाता है।
4हवन/अग्निहोत्र
वैदिक पूजा में अग्नि प्रमुख है। घी, तिल, जौ, समिधा की आहुतियाँ वैदिक मंत्रों सहित दें।
5वेद पाठ
पूजित देवता से सम्बंधित वैदिक सूक्तों का पाठ — श्री सूक्त (लक्ष्मी), पुरुष सूक्त (विष्णु), रुद्र सूक्त (शिव), दुर्गा सूक्त (दुर्गा)।
6शांति पाठ
ॐ द्यौः शान्तिरन्तरिक्षं शान्तिः पृथिवी शान्तिरापः शान्तिरोषधयः शान्तिः...' इत्यादि।
वेदोक्त पूजा की विशेषताएँ
- ▸मंत्रों में छन्द, स्वर, उदात्त-अनुदात्त का कठोर पालन।
- ▸अग्नि (यज्ञ/हवन) अनिवार्य अंग।
- ▸पंचदेव पूजन (सूर्य, गणेश, दुर्गा, शिव, विष्णु)।
- ▸संध्या वंदन (प्रातः-मध्याह्न-सायं) नित्य कर्म।
सरल वेदोक्त नित्य पूजा
यदि विस्तृत विधि सम्भव न हो, तो पंचोपचार (गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य) से भी वैदिक मंत्रों सहित पूजा की जा सकती है।
विशेष: वेदोक्त पूजा में दीक्षा और अधिकार का विशेष महत्व है। गायत्री मंत्र दीक्षा (उपनयन) के बाद ही वैदिक पूजा का पूर्ण अधिकार माना गया है।





