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विस्तृत उत्तर
विरजा नदी को भौतिक जगत और वैकुण्ठ के बीच की पारलौकिक सीमा माना गया है। यह वह सीमा है जहाँ प्राकृत संसार का प्रभाव समाप्त होता है और दिव्य धाम की शुद्धता आरंभ होती है। इस कथा में आदिनाद के कंपन से विरजा का जल जाग्रत होने की बात कही गई है। इसका अर्थ है कि शाश्वत वैकुण्ठ और नई भौतिक सृष्टि के बीच दिव्य संपर्क स्थापित हुआ।
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