विस्तृत उत्तर
श्रीमद्भागवत पुराण के द्वितीय स्कन्ध के प्रथम अध्याय (२.१.२८) में शुकदेव गोस्वामी राजा परीक्षित को भगवान के विराट् रूप का ध्यान करने की विधि बताते हुए विभिन्न लोकों की शारीरिक स्थिति का अत्यंत विशद वर्णन करते हैं। इस शास्त्रीय और ध्यान-परक वर्णन के अनुसार महर्लोक भगवान विराट् पुरुष की ग्रीवा (गर्दन) का साक्षात् प्रतिनिधित्व करता है। इस विराट् रूप की शरीर-रचना में स्वर्लोक वक्षस्थल (छाती) पर है, महर्लोक ग्रीवा (गर्दन) पर है, जनलोक मुख (मुँह) पर है, तपोलोक मस्तक (ललाट) पर है और सत्यलोक शीर्ष (सिर) पर है। इस प्रकार महर्लोक विराट पुरुष की गर्दन पर स्थित है।
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