विस्तृत उत्तर
यक्षों का स्वभाव द्वैतवादी है। वे पूर्णतः तामसिक या राक्षसी नहीं होते, बल्कि अर्द्ध-दैवीय योनि हैं। एक ओर वे प्रकृति के रक्षक, वनों, पर्वतों, झीलों और खजानों के अधिष्ठाता देवता हैं तथा परोपकारी और निरिह रूप में पूजित होते हैं। दूसरी ओर उनका तामसिक और भयंकर रूप भी है, जिसमें वे निर्जन वनों और पर्वतों में यात्रियों को भटकाते हैं, छलते हैं और कभी-कभी राक्षसों की तरह हिंसक होकर मनुष्यों का भक्षण भी करते हैं। यह मिश्रित स्वभाव उनके भीतर रजोगुण, कुछ सात्त्विकता और तामसिक तत्व के संयोग को दर्शाता है।
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