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पद्म पुराण⏱ 5 मिनट पठन

यम-द्वितीया क्या है?

यम-द्वितीया कार्तिक शुक्ल द्वितीया का एक विशेष नाम है।

संक्षिप्त उत्तर

यम-द्वितीया कार्तिक शुक्ल द्वितीया का एक विशेष नाम है। पद्म पुराण के अनुसार प्राचीन काल में देवी यमुना ने इसी तिथि पर अपने भाई यमराज को घर में आदरपूर्वक भोजन कराया था। प्रसन्न यमराज ने द्वितीया को महोत्सर्ग घोषित किया, और नरक के जीवों को भी तृप्ति दी। इसे भाई-दूज या भ्रातृ-द्वितीया भी कहते हैं।

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विस्तृत उत्तर

यम-द्वितीया कार्तिक शुक्ल द्वितीया का एक विशेष नाम है, जो यमराज और यमुना के पौराणिक प्रसंग से जुड़ा है। शास्त्रीय आधार के अनुसार पद्म पुराण के कार्तिक माहात्म्य में द्वितीया तिथि का साक्षात् सम्बन्ध मृत्यु के देवता और पितरों के स्वामी यमराज से स्थापित किया गया है। धर्मशास्त्रों के अनुसार द्वितीया तिथि मात्र पर यमराज का विशेष आधिपत्य रहता है। यद्यपि पद्म पुराण का यह प्रसंग कार्तिक मास की यम-द्वितीया यानी भ्रातृ-द्वितीया से सम्बन्धित है, किन्तु द्वितीया तिथि का यमराज के साथ यह शाश्वत सम्बन्ध आश्विन पितृ पक्ष की द्वितीया पर भी लागू होता है।

यम-द्वितीया की कथा इस प्रकार है। पद्म पुराण के अनुसार प्राचीन काल में द्वितीया तिथि के दिन ही देवी यमुना ने अपने भाई यमराज को अपने घर में आदरपूर्वक भोजन कराया था और उनकी अर्चना की थी। यमुना और यमराज दोनों सूर्य-देव के पुत्र-पुत्री हैं। यमुना ने यमराज को अपने घर बुलाया, श्रद्धा और प्रेम से भोजन कराया, और उनका सम्मान किया।

इस सत्कार से यमराज इतने प्रसन्न हुए कि उन्होंने द्वितीया तिथि को एक महान उत्सव यानी महोत्सर्ग घोषित कर दिया। महोत्सर्ग का अर्थ है महान उत्सव या महान दान। इस घोषणा का अर्थ था कि इस तिथि पर यमराज नरक के जीवों को भी विशेष शान्ति देते हैं।

यम-द्वितीया के कारण नरक के जीव भी तृप्ति पाते हैं। पद्म पुराण के श्लोक में कहा गया है नारकीयाश्च तर्पिताः यानी नारकीय जीव भी तृप्त होते हैं। यानी केवल पितर नहीं, बल्कि नरक में यातना भोग रहे जीव भी इस तिथि पर कुछ समय के लिए शान्ति और तृप्ति पाते हैं।

यम-द्वितीया और भ्रातृ-द्वितीया एक ही हैं। कार्तिक शुक्ल द्वितीया को भाई-दूज या भ्रातृ-द्वितीया भी कहते हैं। यह पर्व भाई-बहन के प्रेम का प्रतीक है। यमुना ने यमराज को भोजन कराया, इसी कारण यह पर्व मनाया जाता है। इस दिन बहनें अपने भाइयों को घर बुलाकर भोजन कराती हैं।

यम-द्वितीया और आश्विन द्वितीया का सम्बन्ध भी विशेष है। कार्तिक की यम-द्वितीया और आश्विन पितृ पक्ष की द्वितीया अलग-अलग अवसर हैं। परंतु दोनों का सम्बन्ध यमराज से है। आश्विन द्वितीया पर यमराज का विशेष आधिपत्य रहने का कारण यही है कि द्वितीया तिथि यमराज से जुड़ी है।

यम-द्वितीया का पितृ पक्ष श्राद्ध पर प्रभाव इस प्रकार है। जब पितृ पक्ष की द्वितीया पर श्राद्ध किया जाता है, तो यमराज की विशिष्ट प्रसन्नता के कारण पितरों को यमदूतों की यातना नहीं सहनी पड़ती, और वे सरलता से ऊर्ध्व लोकों की ओर गमन करते हैं।

यमुना का यमराज के प्रति प्रेम-भाव भी विशेष है। यमुना एक पवित्र नदी हैं। उनका और यमराज का भाई-बहन का सम्बन्ध पवित्र प्रेम का प्रतीक है। यमुना के स्नान से पापों का नाश होता है, और यमराज के कोप से मुक्ति मिलती है।

यम-द्वितीया का व्यावहारिक महत्व आज भी प्रासंगिक है। भाई-दूज के रूप में यह पर्व पूरे भारत में मनाया जाता है। बहनें अपने भाइयों को घर बुलाकर तिलक करती हैं, भोजन कराती हैं, और उनकी दीर्घ आयु की कामना करती हैं। यह यमुना के यमराज के प्रति प्रेम का आधुनिक रूप है।

यम-द्वितीया के दिन विशेष कार्य भी बताए गए हैं। इस दिन यमुना में स्नान करने से पापों का नाश होता है और अकाल मृत्यु का भय नहीं रहता। यमराज के नाम पर दीपदान करने से पितरों को सुख मिलता है।

द्वितीया तिथि पर यमराज के आधिपत्य का सम्बन्ध सीधे श्राद्ध से है। जब पितृ पक्ष की द्वितीया आती है, तो यमराज का आधिपत्य और भी गहरा होता है। इस दिन श्राद्ध करने से यमराज अत्यंत प्रसन्न होते हैं, और पितरों को उनके अधीन किसी भी यातना से मुक्त करते हैं।

इस कथा का सर्वोच्च संदेश यह है कि भाई-बहन का प्रेम इतना पवित्र है कि इससे मृत्यु के देवता भी प्रसन्न होते हैं। यमुना की भक्ति और प्रेम ने यमराज को इस तिथि पर विशेष कृपालु बना दिया। यही कारण है कि द्वितीया तिथि पर श्राद्ध करने से पितरों को विशेष फल मिलता है। शास्त्रीय आधार के रूप में पद्म पुराण कार्तिक माहात्म्य इस सिद्धांत का प्रमुख प्रामाणिक स्रोत है। निष्कर्षतः यम-द्वितीया कार्तिक शुक्ल द्वितीया का एक विशेष नाम है। यह यमुना द्वारा यमराज को भोजन कराने की प्राचीन परम्परा से जुड़ा है। इस दिन यमराज ने द्वितीया को महोत्सर्ग घोषित किया, और नरक के जीवों को भी तृप्ति दी। इसीलिए द्वितीया तिथि पर यमराज का विशेष आधिपत्य रहता है।

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